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20/02/10

सुंदरकाण्ड – हनुमान्‌जी की सुरसा से भेंट

चौपाई :

जात पवनसुत देवन्ह देखा। जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा॥
सुरसा नाम अहिन्ह कै माता। पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता॥
आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा। सुनत बचन कह पवनकुमारा॥
राम काजु करि फिरि मैं आवौं। सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं॥


देवताओं ने पवनपुत्र हनुमान्‌जी को जाते हुए देखा। उनकी विशेष बल-बुद्धि को जानने के लिए उन्होंने सुरसा नामक सर्पों की माता को भेजा, उसने आकर हनुमान्‌जी से यह बात कही, आज देवताओं ने मुझे भोजन दिया है। यह वचन सुनकर पवनकुमार हनुमान्‌जी ने कहा- श्री रामजी का कार्य करके मैं लौट आऊँ और सीताजी की खबर प्रभु को सुना दूँ

तब तव बदन पैठिहउँ आई। सत्य कहउँ मोहि जान दे माई॥
कवनेहुँ जतन देइ नहिं जाना। ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना॥
जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा। कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा॥
सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ। तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ॥


तब मैं आकर तुम्हारे मुँह में घुस जाऊँगा और तुम मुझे खा लेना । हे माता! मैं सत्य कहता हूँ, अभी मुझे जाने दे। जब किसी भी उपाय से उसने जाने नहीं दिया, तब हनुमान्‌जी ने कहा- तो फिर मुझे खा न ले उसने योजनभर मुँह फैलाया। तब हनुमान्‌जी ने अपने शरीर को उससे दूना बढ़ा लिया। उसने सोलह योजन का मुख किया। हनुमान्‌जी तुरंत ही बत्तीस योजन के हो गए

जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा। तासु दून कपि रूप देखावा॥
सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा। अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा॥
बदन पइठि पुनि बाहेर आवा। मागा बिदा ताहि सिरु नावा॥
मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा। बुधि बल मरमु तोर मैं पावा॥


जैसे-जैसे सुरसा मुख का विस्तार बढ़ाती थी, हनुमान्‌जी उसका दूना रूप दिखलाते थे। उसने सौ योजन मुख किया। तब हनुमान्‌जी ने बहुत ही छोटा रूप धारण कर लिया और उसके मुख में घुसकर तुरंत बाहर निकल आए और उसे सिर नवाकर विदा माँगने लगे। उसने कहा मैंने तुम्हारे बुद्धि-बल का भेद पा लिया, जिसके लिए देवताओं ने मुझे भेजा था

दोहा :

राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान। आसिष देइ गई सो हरषि चलेउ हनुमान॥

तुम श्री रामचंद्रजी का सब कार्य करोगे, क्योंकि तुम बल-बुद्धि के भंडार हो। यह आशीर्वाद देकर वह चली गई, तब हनुमान्‌जी हर्षित होकर चले

29/01/10

सुंदरकाण्ड – हनुमानजी का लंका को प्रस्थान

चौपाई :

जामवंत के बचन सुहाए। सुनि हनुमंत हृदय अति भाए॥
तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई। सहि दुख कंद मूल फल खाई॥
जब लगि आवौं सीतहि देखी। होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी॥
यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा । चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा॥

भावार्थ:-जाम्बवान् के सुंदर वचन हनुमानजी के हृदय को बहुत ही भाए। वे बोले- हे भाई! तुम लोग दुःख सहकर, कन्द-मूल-फल खाकर तब तक मेरी राह देखना जब तक मैं सीताजी को देखकर लौट न आऊँ। काम अवश्य होगा, क्योंकि मुझे बहुत ही हर्ष हो रहा है। यह कहकर और सबको मस्तक नवाकर तथा हृदय में श्री रघुनाथजी को धारण करके हनुमानजी हर्षित होकर चले

सिंधु तीर एक भूधर सुंदर। कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर॥
बार-बार रघुबीर सँभारी। तरकेउ पवनतनय बल भारी॥
जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता। चलेउ सो गा पाताल तुरंता॥
जिमि अमोघ रघुपति कर बाना। एही भाँति चलेउ हनुमाना॥

भावार्थ:-समुद्र के तीर पर एक सुंदर पर्वत था। हनुमानजी अनायास ही कूदकर उसके ऊपर जा चढ़े और बार-बार श्री रघुवीर का स्मरण करके उस पर से बड़े वेग से उछले। जिस पर्वत पर हनुमानजी पैर रखकर चले, वह तुरंत ही पाताल में धँस गया। जैसे श्री रघुनाथजी का बाण चलता है, उसी तरह हनुमानजी चले

जलनिधि रघुपति दूत बिचारी। तैं मैनाक होहि श्रम हारी॥

भावार्थ:-समुद्र ने उन्हें श्री रघुनाथजी का दूत समझकर मैनाक पर्वत से कहा कि हे मैनाक! तू इनकी थकावट दूर करने वाला हो।

दोहा :
हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम। राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम॥

भावार्थ:-हनुमानजी ने उसे हाथ से छू दिया, फिर प्रणाम करके कहा- भाई! श्री रामचंद्रजी का काम किए बिना मुझे विश्राम कहाँ?

16/01/10

सुंदरकाण्ड - श्लोक

This post is in continuation of the previous post on Sunderkand. This post completes the starting Shlok of the Sunder Kand.

The first part of this Shlok is devoted to Bhagwan Ram. In this Shlok, devotee asks his Bhagwaan Ram to grant complete devotion towards Him.


नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये
सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा
भक्तिं प्रयच्छ रघुपुंगव निर्भरां मे
कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च

भावार्थ:-हे रघुनाथजी! मैं सत्य कहता हूँ और फिर आप सब जानते ही हैं कि मेरे हृदय में दूसरी कोई इच्छा नहीं है। हे रघुकुलश्रेष्ठ! मुझे अपनी पूर्ण भक्ति दीजिए और मेरे मन को काम आदि दोषों से रहित कीजिए


Second part of the Shlok, devotee prays Bhagwan Hanuman.

अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं
दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्‌
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं
रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि

भावार्थ:-अतुल बल के धाम, सोने के पर्वत सुमेरु के समान कान्तियुक्त शरीर वाले, दैत्य रूपी वन को ध्वंस करने के लिए अग्नि रूप, ज्ञानियों में अग्रगण्य, संपूर्ण गुणों के निधान, वानरों के स्वामी, श्री रघुनाथजी के प्रिय भक्त पवनपुत्र श्री हनुमान्‌जी को मैं प्रणाम करता हूँ

09/01/10

सुंदरकाण्ड

In our last visit to Milwaukee, I was talking to Prashant about our childhood and the places where we grew up. The place where I grew up is a very small place. Our land lord built a small temple in his house. We used to have our daily ‘Aarti’ in the temple and Sunderkand Path on every Tuesday. Suddenly Prashant asked me if I am interested to post Sunderkand in Chai Ki Dukaan. So here I am with my first post.

मंगलाचरण

शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं
ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम्
रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं
वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूडामणिम्

भावार्थ:-शान्त, सनातन, प्रमाणों से परे, निष्पाप, मोक्षरूप परमशान्ति देने वाले, ब्रह्मा, शम्भु और शेषजी से निरंतर सेवित, वेदान्त के द्वारा जानने योग्य, सर्वव्यापक, देवताओं में सबसे बड़े, माया से मनुष्य रूप में दिखने वाले, समस्त पापों को हरने वाले, करुणा की खान, रघुकुल में श्रेष्ठ तथा राजाओं के शिरोमणि राम कहलाने वाले जगदीश्वर की मैं वंदना करता हूँ

04/11/09

right place right time

Got a comment on one of the photographs that I posted on Flickr yesterday… The photograph is from Kanha, a weeklong getaway in Madhya Pradesh last year in March. The comment says, “u r always at right place at right time with right gear :) “ and I have been thinking about it since I read it… my reaction to this comment was “Or let’s say there is something right about every place every time where I end up being! :) ” Too philosophical, maybe impractical too, but something inside me has started believing in that very strongly for a while now! Let me put my Positive thinker hat on and write the rest of this post… no one needs to agree to anything that I say (though personally I want everyone to agree with everything that I say, every time I say it, but that’s a different matter)

Had a unexpected break after I wrote the first paragraph and on second thoughts, I am just letting the gyan session go! Till the time I have brighter side algorithms figured out right for myself, I should be fine!!!

On a completely unrelated note, how many of you have heard the “Sunder Kand” of Tulsi Ramayan? Well, more popularly known as the RamCharitmanas! I love to listen to it, can’t make out even 10% of what is being said, and that when my Nani (mother’s mother) remembers almost all of it, my parents understand it fully. I might work on getting the Sundar Kand of Ramcharitmanas here on Chai ki Dukaan sometime in future!! Some of the reasons why I like listening to it are, the voice of Mukesh, the classical music and instruments, and the unexplainable peace that I get from it!