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16/01/11

ज्ञानचंद दोहेवाले

छुट्टी ऐसे काटिए, के अपने खुश हो जाएँ|
ना कोई अनजाना घर आये, और घर के न बहार जायें||
ना रोटी की चिंता, न नाश्ते की फिकर |
साथ हो बातें हो, बातों से पेट भर जाये ||

Prashant Bhardwaj, Jan-2011

06/01/11

ज्ञानचंद दोहेवाले

ज्ञान वहां पर बांटिये, जहाँ मुनासिब होए |
ऐसन को ज्ञान न बांटिये, जो अब पाए तब खोये||
Prashant Bhardwaj, Jan'11

27/04/10

देखो एक बेचारा

सुबह सवेरे उठकर, बॉस फाइल अभी लाया चिल्ला रहा है!
देखो एक बेचारा काम पर जा रहा है!

सपने में भी मीटिंग्स schedule और reschedule करा रहा है!
देखो एक बेचारा काम पर जा रहा है!

रोज़ सुबह रोज़ शाम
ट्राफ्फिक में फसा हुआ
इधर से उधर और उधर से इधर जाते लोगों को देख
बिना सोचे समझे होर्न बजा रहा है
देखो एक बेचारा काम पर जा रहा है!

रविवार की सुबह से ही सोमवार की सुबह का ग़म उसे तडपा रहा है!
देखो एक बेचारा काम पर जा रहा है!

शाम होने तक न उससे कुछ समझ आता, न वो कुछ समझा पा रहा है!
देखो एक बेचारा काम पर जा रहा है!

इश्क मोहब्बत प्यार इज़हार
ऐसे लफ़्ज़ों का future उससे सिर्फ अन्धकार में नज़र आ रहा है!
देखो एक बेचारा काम पर जा रहा है!

जो करना नहीं चाहता वो ही किये जा रहा रहा है!
देखो एक बेचारा काम पर जा रहा है!

जो करने का दिल करता है, बस वही नहीं कर पा रहा है!
देखो एक बेचारा काम पर जा रहा है!